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Friday, May 7, 2021
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छोटा लाॅकडाउन, बड़ा नुकसान: गुजरात में एक हफ्ते की बंदी से 1050 करोड़ का घाटा, कपड़ा इंडस्ट्री से गांव चले गए सात लाख मजदूर


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सूरत2 घंटे पहले

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दूसरे राज्यों में सख्ती से मंडियां बंद, एक ट्रक कपड़ा भी नहीं जा रहा।

एक हफ्ते की बंदी में 1050 करोड़ रुपए का कपड़ा कारोबार ठप रहा। इंडस्ट्री से अब तक 7 लाख श्रमिक अपने गांव चले गए। जो बचे हैं वे भी जाने को तैयार हैं। व्यापारियों को डर है कि सभी मजदूर चले गए तो पिछले साल जैसी स्थिति आ जाएगी। मजदूरों को बुलाने में बहुत दिक्कत होगी।

यही नहीं चिंता इस बात की भी है कि कहीं पूरा सीजन ही चाैपट न हो जाए। पिछले साल लाॅकडाउन से चाैपट हुए कारोबार ने डेढ़ महीने पहले ही रफ्तार पकड़ी थी, लेकिन फिर से कोरोना ने इस पर ब्रेक लगा दिया। 15 मार्च तक 400 ट्रक माल बाहर जा रहा था, जो धीरे-धीरे कम होकर अब शून्य पर आ गया है।

छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, दिल्ली, राजस्थान, कर्नाटक, केरल और बिहार में लाॅकडाउन की वजह से वहां की मंडियां बंद हैं। इससे अप्रैल से ही कारोबार प्रभावित हो गया था। अब प्रतिदिन सूरत के कपड़ा कारोबार को 150 करोड़ का नुकसान हो रहा है। दो माह के 5 सीजन से 10 हजार करोड़ रुपए का कारोबार होता है, लेकिन अब तक 25-30 फीसदी ही हो पाया है। 22 अप्रैल से शादी का सीजन शुरू हो चुका है, लेकिन पाबंदियों के कारण कपड़ा बाजार में खरीदी काफी कम है।

समस्या: इस समय दूसरे राज्यों में एक ट्रक कपड़ा भी नहीं जा रहा
सूरत टेक्सटाइल गुड्स ट्रांसपोर्ट वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष युवराज देसले ने बताया कि इन दिनों सूरत से अन्य राज्यों में एक ट्रक कपड़ा भी नहीं जा रहा है। छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, दिल्ली, राजस्थान, केरल, कर्नाटक और बिहार में लाॅकडाउन की वजह से कारोबार पूरी तरह ठप हो गया है। हालात बिगड़ते जा रहे हैं।

मार्च-अप्रैल में पूरे साल का 40% कारोबार होता था, इस बार 20% ही
कपड़ा व्यापारी श्रीकृष्ण बंका ने बताया कि पूरे साल का कारोबार मार्च और अप्रैल में होता है, जो इस बार नहीं हो पाया। इस बार कोरोना के कारण चिंता बढ़ी है। बाहर की मंडी से व्यापारी आ नहीं रहे हैं, इसलिए कारोबार पर बड़ा असर देखने को मिल रहा है। कोरोना के बढ़ते मामलों को लेकर आगामी सीजन को लेकर भी कपड़ा व्यापारी चिंतित हैं।

इंडस्ट्री में 15 लाख श्रमिक, हर सेक्टर से औसतन 50% गए
वीविंग-निटिंग इंडस्ट्री में 7 लाख, प्रोसेस हाउस में 3 लाख, एम्ब्रॉयडरी में ढाई लाख और कपड़ा मार्केट में ढाई लाख श्रमिक काम करते हैं। इन सभी सेक्टर से 50% श्रमिक ओडिशा, यूपी-बिहार और बंगाल जा चुके हैं। 7 अप्रैल से अब तक ट्रेन से 3.5 लाख और बस से 3 लाख से अधिक लोग अपने गांव जा चुके हैं।

15 से 20 फीसदी व्यापार ही बचा है, पेमेंट भी नहीं मिल रहा
कपड़ा व्यापारी नरेंद्र साबू ने बताया कि मुश्किल से 15 से 20 फीसदी व्यापार बचा है। दुकान इसलिए बंद नहीं कर रहे कि घर से वसूली हो नहीं पाएगी। काम करने वाले लोगों के भी गांव जाने का डर है। पेमेंट का भी बड़ा संकट है। पिछले साल कोरोना का पेमेंट भी कुछ पार्टियों से लेना बाकी है। ग्रे की खरीदी भी रुकी है।

लूम्स: 40% श्रमिक ही बचे, मार्केट खुलेगा तभी होगा सुधार
प्रमुख विवर मयूर गोलवाला ने बताया कि 40 फीसदी ही श्रमिक बचे हैं। श्रमिकों की कमी और डिमांड नहीं होने की वजह से एक पाली में ही वीविंग मशीनें चलाई जा रही हैं। हालांकि जब कपड़ा मार्केट खुलेगा तभी स्थिति में सुधार आएगा।

जाॅबवर्क: 50 फीसदी श्रमिक पलायन कर चुके हैं, कारोबार मुश्किल हो रहा
साउथ गुजरात टेक्सटाइल प्रोसेसर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष जीतू वखारिया ने बताया कि 10-15% जाॅबवर्क ही हो पा रहा है। 50% श्रमिक पलायन कर चुके हैं। बाकी श्रमिकों को रोक रखा है। अब कर्फ्यू बढ़ता है तो श्रमिकों को रोक पाना मुश्किल होगा। अगर सभी श्रमिक चले गए तो कपड़ा कारोबार के लिए काफी मुश्किल हो जाएगी।

20 फीसदी वीविंग इंडस्ट्री चल रही है, कोई कपड़ा खरीदने वाला नहीं
सचिन GIDC वीवर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष महेंद्र रामोलिया के मुताबिक, वीविंग इंडस्ट्री मुश्किल से 10 से 20 फीसदी ही चल रही है। कपड़ा खरीदने वाला ही कोई नहीं है तो किसके लिए कपड़ा बनाएं। सूरत में कर्फ्यू और अन्य मंडियों में लाॅकडाउन के कारण स्थिति डगमग चल रही है। लेबर भी धीरे-धीरे गांव जाने लगे हैं।

पूरे देश के हालात सुधरे तभी कारोबार पटरी पर आएगा
एसजीटीईए महामंत्री सुनील जैन के मुताबिक, अप्रैल, मई और जून में अच्छा कारोबार होता है। मार्च से अप्रैल तक सीजन का 25 से 30% कारोबार हुआ है। पूरे देश में जब स्थिति सुधरेगी तभी कारोबार पटरी पर आ पाएगा। अभी तो मई में होने वाला कारोबार भी हाथ से निकलता जा रहा है।

बचे हुए 50% श्रमिक भी चले गए तो कारोबार को बड़ा झटका लगेगा
फोस्टा के अध्यक्ष मनोज अग्रवाल के मुताबिक, मार्केट से 50% श्रमिक पलायन कर चुके हैं। जल्द ही हालात नहीं सुधरे तो बचे श्रमिकों को रोक पाना मुश्किल होगा। पिछले साल हुए नुकसान की भरपाई अभी तक नहीं हुई है। इस बार सभी श्रमिक चले गए तो उससे बड़ा झटका लग सकता है।

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